आज क़ब्रिस्तान से गुज़रते हुए, एक रोशनी पर नज़र पड़ी। शायद किसी चाहने वाले ने अपने सगे/ सम्बंधी की क़ब्र पे दिया या मोमबत्ती जला रखी थी। हवाओ से लड़ते हुए वो रोशनी क़ायम थी, मानो कोई योद्धा लड़ते हुए अपनी ज़िन्दगी को क़ायम रखे है, वो बस लड़ रहा है।हवायें तेज़ थी कई बार रोशनी एक दम मंद हो जाती, लगता अब गयी हवा रूकती तो फिर से तेज़ रोशनी। काफ़ी देर तक ये सिलसिला चलता रहा और अन्त में एक तेज़ झोखे ने उसे बुझा दिया ।
मैं देखता गया शायद कोई आदमी उस जगह पे था। जो कुछ हल चल कर रहा था। मेरे भीतर डर था मैं अंदर जाने से घबरा रहा था । वो आदमी कुछ देर के बाद उस क़ब्र पे पहुँचता है और फिर से मचिस से उस दिए को जला देता है । शायद वो हर क़ब्र पे जो दिए / मोमबत्ती बुझती उन्हें फिर से जला देता था । मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ये देखकर,
कुछ देर बाद वो शख़्स गेट के पास आ पहुँचा मैंने उत्सुकतावस उससे पूछा आप यहाँ काम करते हो ?? उसने कहा नहीं मैं यहाँ आराम करता हूँ। मुझे डर लगा उसकी इस बात से,बड़ा अजीब इंसान है शक्ल से भी अजीब लग रहा था । मैंने कहा आप मज़ाक़ कर रहे हो ।
उसने कहा मज़ाक़ तो दुनिया कर रही है। मुझे कुछ समझ नहीं आया मैंने पूछा आप मोमबत्तियों को फिर से क्यूँ जलाते हो ? उसका जवाब था क्यूँकि उसमें काफ़ी धागा और मोम बाक़ी है। मैंने पूछा इस तरह मोमबत्ती और दिए को फिर से जला के आपको क्या मिलता है। वो शख़्स कुछ समय के लिए ख़ामोश हो गया थोड़ी देर बाद बोला
"मैं उसकी उम्मीद को ज़िन्दा रखता हूँ, जब तक उसमें जान है"